GHAZNAVID ATTACK ON AGRA FORT (1086-90 CE)

*आगरा के किले पर गजनवी हमला* 


ऐतिहासिक अनुमान के अनुसार 1086-90 ईसवी के बीच गजनी की सेना ने आगरा के किले पर हमला किया था। यह हमला महमूद गजनवी के परपोते इब्राहीम के पुत्र और सेनापति सैफुदद्दौला महमूद ने किया था। वह गज़नवी सुल्तान इब्राहीम के भारतीय कब्जे वाले भाग का गवर्नर या शासक था और लाहौर या मुल्तान से शासन करता था।  इस समय काल में उत्तर भारत की स्थिति बहुत अच्छी  नहीं थी। उत्तर भारत  में राजनीतिक अस्थिरता थी और मुस्लिम तुर्की सेना गजवा जिहाद के नाम पर आये दिन भारतीय क्षेत्रों में हमला और लूट करती रहती थी।

ग्यारहवीं सदी के आरम्भिक दशकों में आगरा का क्षेत्र कन्नौज के आधीन था, लेकिन कन्नौज पर गजनवी हमलों के बाद से गुर्जर-प्रतिहार राजाओं का पतन हो चुका था, और वे बहुत कमजोर हो गये थे। गजनवी हमलों के दौरान चन्देल राजाओं ने मौके का फायदा उठाकर उनका राज्य केवल कन्नौज शहर तक ही सीमित कर दिया था, और सीमान्त प्रदेशों को अपने अन्दर मिला लिया था। 1036 ईसवी में आखिरी गुर्जर-प्रतिहार शासक यशपाल की हत्या और सत्ता परिवर्तन करके राष्ट्रकूट सामन्तों की एक शाखा का राजगद्दी पर कब्जा हो था, हालाँकि कन्नौज इस समय तक बेहद कमजोर हो चुका था और उनके पास कोई बहुत बड़ा राज्य नहीं रह गया था। अगले 50 साल बेहद अशान्ति और उथल-पुथल के गुजरे, और 1080 के दशक में चन्द्रदेव ने कन्नौज में गहड़वाल वंश की स्थापना करके इसे स्थायित्व प्रदान किया। लेकिन इस समय तक कन्नौज नगर तुर्की फौजों के बार-बार भयंकर आक्रमणों से पूरी तरह नष्ट हो गया था, सुरक्षा की दृष्टि से गहड़वालों ने अपनी मुख्य राजधानी काशी स्थानान्तरित कर ली थी।

जब आगरा पर हमला हुआ, उस समय संभवतः आगरा का क्षेत्र चंदेल या मुरेना से सामन्त कच्छपघातों के आधीन आ चुका था। आगरा के किले पर कच्छपघातों का प्रतिनिधि किलेदार (कोटपाल) नियुक्त था, इसका नाम जयपाल था। आगे कविता में एक वाकया आता हैं जिसमें कवि कहता हैं कि गजनी फौजों द्वारा किले को घेरने पर किलेदार जयपाल को रात्रि एक सपना आता हैं, जिससे वह बहुत बुरी तरह से ड़र जाता हैं। और दूसरे दिन किले से नीचे आकर सैफुल्लाह महमूद गजनी के सामने आत्मसमर्पण करके धर्मपरिवर्तन कर लेता हैं। पर किलेदार द्वारा आत्मसमर्पण करने के बाद भी किले में प्रवेश के लिये सुल्तान-पुत्र सैफुल्लाह को युद्ध करना पड़ता हैं। 

इसका अर्थ यह हो सकता है कि:

1.किलेदार ने केवल व्यक्तिगत रूप से समर्पण किया था,
2.अथवा क़िले की सेना ने तत्काल हथियार नहीं डाले और किले पर तैनाती जारी रखी,
3.अथवा कवि ने पूरे अभियान को नाटकीय रूप में संयोजित किया है, असल में गजनवी फौजों के डर के मारे किलेदार ने धर्मपरिवर्तन करके आत्मसमर्पण कर दिया हो।

यहाँ यह भी पता चलता है कि आगरा के किले की रक्षा में ज्वलनशील पदार्थ/आग का प्रयोग हुआ था। हमें यह जानकारी हैं कि दसवी-ग्यारहवी सदी में मध्यपूर्व के क्रूसेडस के दौरान छोटे मिट्टी के कुल्हडों में ज्वलनशील नेफ्था भर कर किले की दीवारों से बम की तरह दुश्मनों पर फेंका जाता था। यह हथियार मुस्लिम और क्रिश्चियन सेना दोनों ही इस्तेमाल करते थे। बहुत हद तक यह संभव हैं कि भारत में भी ऐसी कोई तकनीकि इस्तेमाल में लायी जा रही हो जिसमें छोटे-छोटे कुल्हडों  या घड़ों में ज्वलनशील तेल या नेफ्था भर कर ऊपर से कपड़ा बाँधकर आग लगाकर शत्रुओं के ऊपर फेंका जाता हो।

यह रजना फारसी कवि मसूद-साद-सलमान ने *बादशाह की प्रशंसा और आगरह किले की विजय पर बधाई* के कसीदे के रूप में की हैं । यहाँ कई जरूरी बातें अंकित हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं कि कवि इस गजनवी राजकुमार के लश्कर के साथ ही चलता था, इस बात को उसने अपनी कविता में लिखा भी हैं कि वह स्वंय आगरा विजय के अभियान में मौजूद था...।।

फारसी कविता - हिन्दी अनुवाद के साथ

*पयाम ख़्वाहम दादन तो रा बे हफ़्त इक़लीम, चू फ़त्हनामा बदादी, पयाम हम बगुज़ार।*
मैं तुम्हें सातों महाद्वीपों तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए भेजूँगा; जब तुम विजय-पत्र पहुँचा दो, तो मेरा संदेश भी साथ पहुँचा देना।

*तू ख़ुद मुशाहिद-ए हाली ओ बूदा हाज़िर, बे कारज़ार-ए शहनशह पयाम-ए मन बे चे कार?*
तुम (दूत) स्वयं वर्तमान घटना के प्रत्यक्षदर्शी हो और वहाँ उपस्थित रहे हो; शहनशाह के युद्ध का समाचार पहुँचाने के लिए फिर मेरे संदेश की क्या आवश्यकता है?

*बगो कि चून मलिक-ए अस्र, सैफ़-ए दौलत ओ दीन, ख़ुदाय्गान-ए जहाँ, ख़ुसरव-ए सिग़ार ओ किबार*
कहो कि जब अपने युग के सुल्तान, दौलत और धर्म की तलवार (सैफ-उद-दौला-उद-दीन) की तरह संसार के अधिपति हैं, छोटे-बड़े सबके राजा( ख़ुसरो) हैं।

*ज़ बह्र-ए नुसरत-ए इस्लाम रा ज़ दारुल-मुल्क, बे बूम-ए हिन्द दर-आवरद लश्कर-ए जर्रार।*
इस्लाम की मजबूती और विजय के लिए उसने अपनी राजधानी (दारूल-मुल्क) से भारत (हिन्द) की धरती पर एक विशाल और प्रचण्ड (ज़र्रार) सेना प्रवेश कराई।

*बदान कि ता नबूद लश्करी गिराँ ओ बुज़ुर्ग, ख़ियारा कर्द ज़ लश्कर चहल हज़ार सवार।*
जान लो कि विशाल अजेय और अत्याधिक भारी (कवच से भारी) सेना बनाने के उद्देश्य से; उसने सेना में चालीस हज़ार विशेष घुड़सवार योद्धा (खियारे कर्द) चुने। [40,000 की विशाल घुडसवार सेना सच में किसी भी मानक से ज्यादा हैं। इतने सारे घुड़सवार सेना तो भारत के राजा भी खड़ी नहीं कर पाते थे।]

*चू चर्ख़-ए कीना-कश ओ चू ज़माना बा-क़ुव्वत, चू अब्र-ए तूफ़ान-फ़ेअल ओ चू अब्र-ए साअक़ा-बार।*
वे प्रतिशोधी आकाश की तरह, और शक्तिशाली समय की तरह थे; तूफ़ान बरसाने वाले बिजली गिराने वाले बादल के समान।

*रही गिरिफ़्ता बे पीश अन्दरूँ दराज़ ओ महीब, हमा ज़मींश संग ओ हमा नबातश ख़ार।*
उनके सामने एक लम्बा और भयावह मार्ग था; जिसकी सारी भूमि पथरीली थी और जिसकी सारी वनस्पति काँटों भरी थी।

*शुआ-ए कौकब-ए साबित बे चर्ख़ बर रहबर, मसीर-ए देव-ए दज़आगह बे ख़ाक बर हंज़ार।*
आकाश में स्थिर तारों की किरण उनके लिए मार्गदर्शक थी; और ज़मीन पर भयंकर दानवाकार सेना का रास्ता पूरी तरह सीधा और अनुशासित (संरेखित) था।  _[कवि द्वारा बार-बार विशाल सेना का जिक्र उसके द्वारा लिखे गये अन्य अभियानों में नहीं हैं, ऐसा प्रतीत होता हैं कि यह गजनवियों द्वारा अभी तक भारत में भेजा गया सबसे बड़ा अभियान था]_

*हमि ख़रामिद अन्दर मियान-ए हिन्दुस्तान, फ़राश्ता सर-ए रायअत बे गुम्बद-ए दव्वार।*
वह [विशाल सेना] पूरे शान से हिंदुस्तान के बीचों-बीच आगे बढ़ती चली गई, और उसके शाही परचम (ध्वज) की नोक घूमते हुए आसमान की बुलंदियों को छू रही थी।

*सिपिहर-ए नेक-सिगाल ओ ज़माँ फ़रमान-बर, ख़ुदाय राहनुमा ओ मलायकह अन्सार।*
आकाश शुभ-चिन्तक था और समय उसके आदेश का पालन कर रहा था; खुदा उसका मार्गदर्शक था और फ़रिश्ते (मलाइका) उसके सहायक।

*बदो मुलूक ज़ अत़राफ़ रूय निहादन्द, चुनाँ कि आयद ज़ आफ़ाक़ सूय-ए बह्र-ए नहार।*
चारों ओर के [हिन्दु] राजा उसकी ओर [समर्पण करने] आने लगे, ठीक वैसे जैसे दूर-दूर के प्रदेशों से नदियाँ बहकर समुद्र में आती हैं।

*कमीनह ख़िदमत-ए हर यक ज़ तन कि सद बद्रह, कहीनह हदियह-ए हर यक ज़ जामह सद ख़रवार।*
उनमें से प्रत्येक राजा ने मामूली नजराने में सोने-चाँदी के शुद्ध सिक्के (टंका) की सौ थैलियाँ दी, और प्रत्येक छोटी-से-छोटी भेंट में भी कीमती वस्त्रों के सौ ख़रवार (गधे के बोझ के बराबर) दिये।

*गही गुज़ाश्त हिसार ओ गही गुज़ाश्त ज़मीन, गहश मक़ाम बे बीशह, गहश नुज़ूल बे ग़ार।*
कभी उसने क़िले के पास पड़ाव (नुजूल) डाला और कभी खुले मैदान में; कभी उसका ठिकाना जंगल हुआ और कभी किसी गुफ़ा में उसका पड़ाव पड़ा।

*चू मी-गुज़श्त गुज़र कर्द रायअत-ए आलीश, बे गर्द-ए तीरेह बपोशीद चर्ख़ आइनह-वार।*
जब उनका बुलंद और आलीशान शाही परचम (ध्वज) आगे बढ़ता था, तो [सेना के चलने से उड़ी] काली धूल से आईने जैसे साफ़ और चमकदार आसमान को पूरी तरह ढक लेता था।

*हिसार-ए अगरह पदिद शुद अज़ मियान-ए गर्द, बे-सान-ए कोह बर ऊ बारह-हा-ए चूँ कूहसार।*
धूल के भारी गुबार के बीच से आगरा (अगरह) का क़िला दिखाई पड़ा; वह खुद एक विशाल पहाड़ के समान था और उसकी प्राचीरें (दीवारे) पर्वत-शृंखलाओं जैसी ऊँची थीं।

*पय-ए ऊ रफ़्तह दर आँजा कि क़रार-ए माही सर-ए ऊ बर शुदह आँजा कि बनात ओ ख़रचंग*
उस (क़िले) की नींव (जड़) वहाँ तक नीचे गई है जहाँ (पाताल में) मछली विश्राम करती है, और उसका शिखर वहाँ तक ऊपर उठा हुआ है जहाँ आकाश में सप्तर्षि तारा-मंडल (बनात) और कर्क राशि (खरचंग) स्थित हैं।

*गिर्द-ए ऊ बीशह ओ कोह-ए गशन ओ सब्ज़ चनाँक गुज़र-ए बाद ओ रह-ए मार दरू नाख़ुश ओ तंग*
उसके चारों ओर घने वन और हरे-भरे पर्वत थे, जहाँ हवा का मार्ग दूभर हैं और रास्ता भी साँप की चाल की तरह कठिन और संकरा था।

*किश्वरी बूद न क़लअह, हमा पुर मर्द-ए दिलीर बर हवा बर शुदह ओ साख़्तह अज़ आहन ओ संग*
वह केवल एक किला नहीं, मानो एक पूरा राज्य था, वीर योद्धाओं से भरा हुआ, और लोहे तथा पत्थर से निर्मित।

*बे हुस्न-ए रुत्बत-ए ऊ नारसीदह दस्त-ए क़ज़ा, नकर्दह बा वई ग़दरी ज़माने-ए ग़द्दार।*
आगरा के किले की बुलंद बुलंदियों (शान) को [आज तक] तक़दीर का [विनाशकारी] हाथ छू भी नहीं पाया था और न ही इस दगाबाज़ ज़माने ने कभी इस [अभेद्य] दुर्ग के साथ कोई विश्वासघात (ग़द्दारी) किया था। _[कवि के अनुसार न तो इस किले पर कभी किसी मुस्लिम शासक का ताकत से कब्जा हो पाया था और ना ही किसी गद्दार को खरीद कर इस किले के द्वारा खुलवाये जा पाये थे। यह अभेद्य था।]_

*सिपह चू दाइरह पीचीद गर्द-ए हिस्न ओ हमी, नुमूद हिस्न अज़ ऊ हमचू नुक़्तह-ए परगार।*
गजनवी सैफुद्दौला की सेना ने क़िले के चारों ओर गोलाई में इतना घना घेरा डाल दिया, और क़िला उस घेरे के बीच गोले (परकार) के केन्द्र-बिन्दु के समान दिखाई देने लगा।

*बे कारज़ार ज़दह दस्त ओ गर्म गश्तह नबर्द, ज़ तेग़-ए आहन-सनब ओ ज़ तीर-ए ख़ारह-गुज़ार।*
दोनों सेनाएँ युद्ध में पूरी तरह भिड़ गईं और संग्राम (लड़ाई) अत्यंत भीषण (गर्म) हो गया, जहाँ लोहे [के कवच] को छेद देने वाली तलवारें (तेग) चल रही थीं और कठोर चट्टानों को चीर देने वाले तीर बरस रहे थे।

*बे ख़्वाब दीद दिगर शब अमीर आँ चिपाल, यकी बुलन्दी ओ ऊ बर सरश गिरिफ़्तह क़रार।*
अगली रात आगरा के किले के उस अमीर (किलेदार) जयपाल ने सपने में देखा, कि एक बहुत ऊँचा टीला (या पहाड़) है और वह खुद उसकी चोटी पर खड़ा है। _[यह किलेदार संभवतः मुरेना के कच्छपघात राजाओं या फिर चन्देलों के आधीन होगा]_

*शुदह हरासाँ अज़ जान ओ गर्द बर गर्दश, हमा सरासर पुर-ए शरज़ह शीर ओ अफ़ई-ए मार।*
[सपने में ही] वह अपने प्राणों के लिए भयभीत था और उसके चारों ओर हर ओर उग्र सिंह और विषैले सर्प भरे हुए थे।

*ज़ दूर दीदह यकी मरग़ज़ार-ए ख़ुर्रम ओ सब्ज़, दरो कशीदह यकी सायबान-ए पुर-ए ज़ंगार।*
दूर उसने एक हरा-भरा और खुशनुमा घास का मैदान देखा,जिसके बीचों-बीच एक विशाल तांबे के रंग का शामियाना (तंबू) तना हुआ था।

*निहादह तख़्ती ज़रीन बर ऊ फ़रिश्तह-वशी, दो फ़ौज हूर कमर-बस्तह बर यमीन ओ यसार।*
वहाँ छत्र के नीचे एक स्वर्णिम सिंहासन रखा था और उस पर एक फ़रिश्ते के समान दिव्य पुरुष बैठा था; उसके दाएँ और बाएँ अप्सराओं(हूरों) की दो कतारे कमरबद्ध होकर खड़ी थे।

*ख़याल-ए दौलतश आमद फ़राज़ ओ गोफ़्त बदू, कि अज़ ज़लालत-ए ख़ुद गश्त बायदत बेज़ार।*
सुल्तान (सैफुद्दौला) के राजसी भाग्य का साया उसके सामने प्रकट हुआ और उस (जयपाल) से बोला: यह तुम्हारे लिए ज़रूरी है कि तुम अपने इस ग़लत रास्ते (जलालत) को छोड़ (तौबा-बेजार) दो। _[गलत रास्ता मतलब मूर्तिपूजा हिन्दु धर्म]_

*बबायदत बर आँ सायबान-ए रंगीन शुद, वज़ आँ फ़रिश्तह बबायदत ख़्वास्तन ज़िनहार।*
तुझे उस रंगीन छत्र के साये के नीचे जाना चाहिए, और उस फ़रिश्ते से शरण माँगनी चाहिए।

*चू दीद चिपाल ईन ख़्वाब-ए सहमगीं दर वक़्त, गिरिफ़्त लर्ज़ह ओ गश्त अज़ नहिब-ए आँ बेदार।*
जयपाल (चिपाल) इस भयावह स्वप्न देखकर उस वक्त सहम गया वह काँप उठा और भयानक दहशत से जाग गया।

*यक़ीन शुद ऊ रा कान सायबान-ए महमूदी-स्त, दरो नशस्तह शाह-ए फ़रिश्तह-किरदार।*
उसे विश्वास हो गया कि वह छत्र सुल्तान महमूद सैफुद्दौला का है, और उसके नीचे फ़रिश्ते के समान आचरण वाला राजा (शाह) बैठा है।

*सरायियान ओ ग़ुलामान दो फ़ौज बस्तह कमर, सिपाह-ए ऊस्त चू शीर ओ चू मार गर्द-ए हिसार।*
महल के सेवक और ग़ुलाम दो कतारों में कमर बाँधे तैयार खड़े हैं; और उसकी सेना क़िले (आगरा) के चारों ओर सिंह और सर्पों की तरह मंडरा रही है।

*चू शम्अ-ए रोज़ शुद अज़ कल्लह-ए कबूद पदिद, ज़मीन ज़ हिल्लह-ए ज़रबफ़्त सुर्ख़ कर्द ओ शिआर।*
जब दिन का दीपक—सूर्य—नीले आकाश में बाहर निकल आया,  तो उसने धरती को सुनहरी-बुने हुए लाल वस्त्र (रंग) से ढँक दिया। _[यहाँ कवि सुबह-सुबह की लालिमा का वर्णन कर रहा हैं।]_

*अमीर-ए अगरह चिपाल अज़ सर-ए गुम्बद, फ़रूदवीद ओ बे पस्त आमद अज़ बुलन्द हिसार।*
आगरा किले का किलेदार (अमीर) जयपाल (चिपाल) क़िले के ऊँचे शिखर से नीचे उतर आया और उस ऊँची प्राचीर (दीवार) से धरातल पर आ पहुँचा।

*सराय-पर्दह-ए सैफ़ी बदीद ओ ख़िदमत कर्द, बज़ दो दस्त ओ बकन्द अज़ मियान-ए ख़ुद ज़ुन्नार।*
उसने सैफ़ी (सैफुल्लाद्दीन गजनवी) का शाही तंबू और दरबार देखा और सेवा में उपस्थित हुआ; दोनों हाथों से झुककर उसने अपनी कमर से जनेऊ(ज़ुन्नार) के फेंक दिया।

*पयाम दाद बे ख़ुसरव कि ऐ बुज़ुर्ग-मुल्क, गुनाह करदम ओ करदम बदाँ गुनाह इक़रार।*
उसने सम्राट इब्राहीम (खुसरो) को संदेश भेजा: “हे महान राज्याधिपति! मैंने अपराध किया है और उस अपराध को स्वीकार करता हूँ।”

*बे बन्दगीयत मुक़र्रम, तुआम ख़ुदावन्दी, गुज़ाश्तम हमा इस्याँ, तू जुर्म-ए मन बगुज़ार।*
“मैं आपकी दासता (बन्दगी) को स्वीकार करता हूँ; आप मेरे स्वामी (खुदा) है। मैंने अपने सारे विद्रोह त्याग दिए—अब मेरे अपराध (जुर्म) को क्षमा कर दे।”

*अगर तू अफ़्व कुनी बर दिलम बबख़्शाई, कुनम ज़ तन कि बे बाला-ए ईन हिसार अम्बार।*
“यदि तुम मुझे क्षमा कर दो और मुझ पर दया करो, तो मैं इस दुर्ग (क़िले) की दीवार जितनी ऊँची लाशों का ढेर लगा दूँगा।” _[यहाँ ऐसा प्रतीत हो रहा हैं कि किलेदार की गद्दारी की वजह से अन्य हिन्दु सरदारों ने उसे बाहर निकाल दिया और अब वह सुल्तान से कह रहा हैं कि यदि वह अपने साथ मिला ले तो जयपाल स्वंय किले को पाने के लिये लड़ेगा।]_

*जवाब दाद शहनशाह सैफ़-ए दौलत ओ दीन, कि आमदम बे ग़ज़ा मन बदीन बिलाद ओ दियार।*
दौलत और दीन की तलवार (सैफुद्दौलाद्दीन), शहनशाह ने उत्तर दिया: “मैं इन प्रदेशों और देशों में धर्मयुद्ध (गजवा) करने के लिए आया हूँ।”

*हिसार दीदम बेमर ओ लेक हर यक रा, गुशादह बूद बदीन लश्कर हुदा सद बार।*
“मैंने बहुत-से क़िले देखे हैं, और प्रत्येक को इस सेना के सामने सौ-सौ बार खुलते हुए देखा है।”

*हमि बोजुस्तम हिस्न-ए अज़ीम ओ दूशिज़ह, कि दर जहाँ नबदश हीच ख़ुसरव ओ सालार।*
“मैं तो एक ऐसे विशाल और अजेय क़िले की खोज कर रहा था, जिसके समान संसार में किसी राजा या सेनापति के पास कोई क़िला न हो।”

*कुनूँ कि याफ़्तह अम ईन हिसार-ए अगरह रा, अज़ीं हिसार बरआरम बे तेग़ ओ तीर दिमार।*
“अब जबकि मुझे आगरा का यह क़िला (हिसार) मिल गया है, मैं तलवार (तेग) और तीर से इस क़िले का सर्वनाश कर दूँगा।”

*मुलूक रा हमा मक़सूद सीम ओ ज़र बाशद, मराद-ए हमा अफ़्व-ए ईज़द-ए दादार।*
“राजाओं का एकमात्र उद्देश्य प्रायः चाँदी और सोना पाना होता है; लेकिन मेरा सम्पूर्ण उद्देश्य सृष्टिकर्ता ईश्वर(अफ़्व-ए ईज़द) की क्षमा है।”

*पस आँ गही बे सिपह गोफ़्त जंग पीवन्दन्द, मन ईन हिसार बिगीरम बे औन-ए ईज़द-ए बार।*
इसके बाद उसने सेना से कहा कि युद्ध में जुट जाओ; “मैं ईश्वर की सहायता से इस क़िले को जीत लूँगा।”

*सिपाह गर्द-ए हिसार अन्दर आमदन्द चुनाँक, मुबारिज़ाँ रा चून लैल मी-नुमूद नहार।*
सेना इस प्रकार क़िले के चारों ओर आ पहुँची कि योद्धाओं को दिन भी रात के समान दिखाई देने लगा। (युद्ध की धूल की वजह से अँधेरा )

*हिसार-ए अगरह माँदह मियान-ए दो सिपह, बरूनश लश्कर-ए इस्लाम ओ दर दरूँ कुफ़्फ़ार।*
आगरा का क़िला दो सेनाओं के बीच घिरा हुआ रह गया— बाहर इस्लामी सेना थी और भीतर काफ़िरों की सेना।

*बे-सान-ए चर्ख़ बर ऊ संग-ए मनजनीक रवाँ, चुनाँ कि बे-सूय-ए चर्ख़ दावत-ए अबरार।*
उस पर मानो आकाशीय पहिये की भाँति मंजनीक (Trebuchet) के पत्थर लगातार चल रहे थे, ऐसे जैसे वे आकाश की ओर नेक पवित्र लोगों की दुआयें लेकर जा रहे हों। _(मंजनीक किले की दीवारों पर भारी पत्थर फेंकने वाली मशीन थी, तोप के आविष्कार से पहले किले दीवारों को तोड़ने के लिये प्रयुक्त की जाती थी)_

*पियादह दीदम बा ख़ुद ओ जोशन ओ ख़ंजर, हमि ख़ज़ीद बे-किरदार-ए मार बर दीवार।*
मैंने एक पैदल सैनिक (प्यादे) को देखा, जो सिर पर ख़ुद (हेलमेट), शरीर पर कवच (जोशन) पहने और हाथ में ख़ंजर लिए, साँप की तरह दीवार पर रेंगता हुआ ऊपर चढ़ रहा था। (कवि ने यह दूसरी बार प्रमाण दिया हैं कि वह युद्ध क्षेत्र में मौजूद था)

*बे संग ओ तीर ओ बे आतश हमि नगश्त जुदा, बदोख़्तन्दश गूई बे आहनिन मसमार।*
पत्थर, तीर और अग्नि के प्रहारों के बावजूद वह दीवार से अलग न हुआ; मानो उसे लोहे की कीलों से वहीं जड़ दिया गया हो।

*हज़ार ज़ख़्म फ़कन्द ओ दिलश नगश्त मलाल, हज़ार ज़ख़्म बख़ुर्द ओ तनश नगश्त फ़गार।*
उसने  (शत्रुओं पर) हज़ार घाव किए, फिर भी उसका हृदय निराश न हुआ; उसने हज़ार घाव खाए, फिर भी उसका शरीर पस्त न हुआ।

*हर आतशी कि बिअन्दाख़्तन्दी अज़ कंगर, चुनाँ नमूदी कज़ चर्ख़ कौकब-ए सय्यार।*
क़िले की प्राचीरों की ऊँचाई (कंगूरों) से जो भी आग का गोला फेंका जाता, वह ऐसा दिखाई देता था मानो आकाश टूटता हुआ तारा (कोकब-ए-सय्यार) गिर रहा हो।

*हर आँ सव्वारी कन्दर मियान-ए आतश रफ़्त, व अगरचे बूद ज़ आतश बे गर्द-ए आँ अम्बार।*
सुल्तान का घुड़सवार उस भयंकर आग के बीच जा पहुँचा यद्यपि उसके चारों ओर अग्नि का विशाल अम्बार लगा था।

*बरून शुद ऊ चू बराहिम-ए आज़र अज़ आज़र, बे गर्दश आतश-ए सोज़न्दह गश्त चू गुलज़ार।*
वह उस अग्नि से वैसे ही सुरक्षित निकल आया जैसे इब्राहीम (पैगम्बर) आज़र (अब्राहम का मूर्तिपूजक पिता) की अग्नि से निकले थे; उसके चारों ओर जलती हुई आग मानो फूलों का बाग़ बन गई। _[यहाँ कवि अब्राहम और अग्नि की प्रसिद्ध इस्लामी कथा की ओर संकेत करता है। क़ुरआन (21:69)]_

*बे ज़ीरश अन्दर शाख़-ए बनफ़शह गश्त ज़ुकाल, बे गर्दश अन्दर बर्ग-ए शुक़ूफ़ह गश्त शरार।*
उसके नीचे आने वाले बैंगनी फूलों की शाखाओं अंगारे जैसी हो गयी, और उसके फूलों की पत्तियों चारों ओर उड़ती चिनगारियाँ जैसी दिखाई देने लगीं।

*गुज़श्त रूज़ी चन्द ओ हमि नयासूदन्द, सिपह ज़ कुशिश दर रोज़-ए रोशन ओ शब-ए तार।*
कई दिन बीत गए, फिर भी सेना ने विश्राम नहीं किया; दिन के उजाले और अँधेरी रात—दोनों में वह निरन्तर प्रयत्न करती रही।

*शबी कि बूद बस्सी सहमगीं-तर अज़ दूज़ख़, करियह ओ ज़िश्त चू दूद ओ सियाह ओ तीरेह चू क़ार।*
एक रात ऐसी आई जो दोज़ख़ (नर्क) से भी अधिक भयावह थी—धुएँ जैसी कुरूप और भयानक, और तारकोल की तरह काली और अँधेरी थी।

*चू रअद अज़ अब्र बग़रीद कूस-ए महमूदी, बरआमद अज़ पस-ए दीवार-ए हिस्न मारामार।*
जब महमूदी नगाड़ा बादल से गरजते हुए रुद्र-गर्जन के समान बजा, तो क़िले की दीवारों के पीछे से मारो-मारो (घमासान) की ध्वनि से युद्ध का कोलाहल उठ पड़ा।

*सरायियान-ए मुल्क जुमलगी बजोशीदन्द, बरआमदन्द बहर-ए कंगर अज़दहा-किरदार।*
राजा के सभी सैनिक जोश में आ उठे; वे क़िले के बुर्जों (कंगूरों) की ओर ऐसे बढ़े जैसे अजगर हों।

*बे तेग़ करदन्द अज़ ख़ून-ए दुश्मनान हदी, ज़मीन-ए अगरह हमचू ज़मीन-ए दरिया-बार।*
तलवारों (तेग) के प्रहार से शत्रुओं का इतना रक्त बहा कि आगरा की धरती को खून के समुद्र से भर दिया।

*चू दर हिसार बजोशीद तारक-ए गबराँ, ज़ ताब-ए आतश-ए शमशीर गर्म शुद पिकार।*
जब क़िले के भीतर काफ़िरों (गबरूओं) के सिर क्रोध और भय से खौल उठे, तो तलवारों की आग की तपिश से युद्ध और भी प्रचण्ड हो गया।

*हमि नमूद ज़ रूय-ए हुसाम ख़ून-ए अदू, चू आब-ए शंगरफ़ ज़ रूय-ए तख़्तह-ए ज़ंगार।*
तलवार की सतह पर शत्रुओं का रक्त ऐसा दिखाई देता था जैसे हरे-नीले रंग के पट्ट पर बहता हुआ चमकीला लाल सिंदूर (शंगरफ़) हो।

*ज़ तर्स-ए चनबर-ए गर्दूँ बाइस्तादह ज़ दूर, ज़ सहम-ए चश्मह-ए ख़ुर्शीद दर-शुदह बे ग़ुबार।*
भय के कारण आकाश मंडल दूर खड़ा हुआ-सा प्रतीत होता था; और सूर्य का स्रोत भी आतंक की धूल में छिप गया था।

*हुसाम बर्राँ दर सर बे मअदन-ए दानिश, सिहाम-ए पर्रादँर दिल बे मौज़े-ए असरार।*
तीखी तलवारें सिरों पर इस प्रकार पड़ रही थीं मानो ज्ञान (दिमाग़) की खान तक पहुँच रही हों; और उड़ते हुए तीर दिलों में ऐसे जा रहे थे जैसे रहस्यों के स्थान (हृदय) तक पहुँचते हों।

*ख़ुदावन्दग़ार रा दीदम बे गर्द-ए रज़्म अन्दर, चू शरज़ह शीर बे दस्त-ए अज़दहा-ए मर्दुमख़्वार।*
मैंने अपने स्वामी को युद्ध के बीच देखा— उग्र सिंह के समान, मानो उसके हाथ में मनुष्यभक्षी अजगर (तलवार) हो। _[यहाँ एक बार फिर कवि युद्ध के बीचोबीच अपने स्वामी सैफुद्दौलाद्दीन को देखने के जिक्र करता हैं]_

*तबारक-अल्लाह, चश्म-ए बद अज़ कमालश दूर, चू नूर बूद बर आँ मर्कब-ए जहन्दह चू नार।*
अल्लाह की शान! बुरी नज़र उस (सैफुद्दौलाद्दीन गजनवी) के पूर्ण वैभव से दूर रहे; वह उस अग्नि-समान दौड़ते हुए घोड़े पर ऐसे चमक रहा था जैसे कि प्रकाश।

*गुशादह-दस्त बे ज़ख़्म ओ बबस्तह तंग-मियान, ज़ बह्र-ए ख़ुशंदी ओ अफ़्व-ए ईज़द-ए दादार।*
वह घाव करने के लिए हाथ खोले हुए था और कमर कसकर तैयार था—ईश्वर की प्रसन्नता और सृष्टिकर्ता की क्षमा प्राप्त करने के लिए।

*ज़ ग़ाज़ियान बे हिसार अन्दरूँ दरआमद बाँग, ज़ मुल्क-ए ख़ुसरव महमूद बाद बरख़ुर्दार।*
ग़ाज़ियों की ओर से क़िले के भीतर युद्ध-घोष की आवाज़ पहुँच गई; सुल्तान महमूद का राज्य समृद्ध और भाग्यशाली रहे।

*ईं चुनीं क़लअह महमूद जहानदार गिरिफ़्त ब-दिलीरी ओ शुजाअत न ब-मक्र ओ निरंग*
ऐसे दुर्ग को विश्वविजेता (सैफुल्लाह) महमूद ने जीता, वीरता और साहस से, न कि छल और कपट से।

*ख़ुदावन्दगाना, हर वक़्त फ़त्ह ख़ुश बाशद, वलीक ख़ुश्तर बाशद बे रोज़गार-ए बहार।*
हे मेरे स्वामी! हर समय विजय सुखद होती है, लेकिन बसन्त के समय मिली विजय उससे भी अधिक सुखद होती है।

*माह-ए नौरोज़ दिगर बार ब-मा रूय नुमूद क़लअ-ए अगरह दरआवर्द मलिकज़ादह ब-चंग*
नौरोज़ का महीना फिर हमारे सामने आया, और राजकुमार ने आगरा के दुर्ग को अपने अधिकार में कर लिया।

*पुश्तह-हा कर्द ज़ बस कुश्तह दर ओ पंजह जाए जूय-ए ख़ून कर्द ब-हर पुश्तह रवाँ सद फ़रसंग*
युद्धभूमि में इतने शव गिरे कि ढेर बन गए, और प्रत्येक ढेर से रक्त की धारा मानो सौ फ़रसंग तक बह निकली। _(शवो के मीनार या पिरामिड़ बनाने की इनकी परम्परा थी)_

*बुर्दह ज़ंजीर ब-ज़ंजीर अज़ आँ क़लअह क़तार हमचुनाँस्त कि बर रूय-ए हवा सफ़्फ़-ए कुलंग*
उस दुर्ग से बंदियों को ज़ंजीरों में बाँधकर कतारों में निकाला गया, जो आकाश में उड़ते सारसों की पंक्ति के समान दिखाई देते थे।

*ज़ीं पस नामह-ए फ़त्ह-ए तू सू-ए हज़रत-ए शाह दम-दम आयद हमी अज़ मअबर-ए चीन ओ लब-ए गंग*
इसके बाद तेरी विजयों के समाचार-पत्र चीन की सीमाओं और गंगा के तटों से निरन्तर शाही (गजनी के) दरबार में पहुँचेंगे।

*इख़्तियार-ए तू दरीं वक़्त सू-ए अज़्म-ए सफ़र अज़ पय-ए क़ुव्वत-ए दीन ओ क़ब्ल-ए हमीयत ओ नंग*
किन्तु तूने ऐसे समय में यात्रा और अभियान का निश्चय किया, इस्लाम की कुव्वत(शक्ति) बढ़ाने तथा सम्मान और गौरव की रक्षा के लिए।

*हर्ब-ए कुफ़्फ़ार गज़ीदह ब-दल-ए मज्लिस-ए बज्म बांग-ए तकबीर शनूदह ब-दल-ए नग़्मह-ए चंग*
तूने उत्सव मनोरंजन-सभा के स्थान पर काफ़िरों से गजवा (धर्मयुद्ध) को चुना, और वीणा के गीत के स्थान पर तकबीर (नारा-ए-तकबीर) की पुकार सुनी।

*नुमूद दर हिन्द आसार-ए फ़त्ह-ए शमशीरत, “चुनीन नमायद शमशीर-ए ख़ुसरवान आसार।”*
भारत में तुम्हारी तलवार (शमशीर) ने विजय के ऐसे चिह्न प्रकट किए हैं— “राजाओं की तलवारों के प्रभाव ऐसे ही दिखाई देते हैं।”

*हुसाम-ए तीज़-ए तू शुद ज़ुल्फ़िक़ार ओ हिन्द अरब, हिसार-ए अगरह ख़ैबर, तू हैदर-ए कर्रार।*
तुम्हारी तीखी तलवार ज़ुल्फ़िकार (अली की तलवार) बन गई और हिन्द मानो अरब हो गया; आगरा का क़िला ख़ैबर (खैबर का किला) बन गया और तुम हैदर-ए कर्रार (अली की उपाधि) हो।

*हुसाम-ए तूस्त अजल, वज़ अजल के जुस्त अमान? सिनान-ए तूस्त क़ज़ा, वज़ क़ज़ा के याफ़्त फ़रार?*
तुम्हारी तलवार ही मृत्यु है—और मृत्यु से कौन शरण पा सकता है? तुम्हारा भाला ही तकदीर है—और तकदीर से कौन भाग सकता है? 
_(यहाँ पर यह रूपक विशेषतौर पर आगरा के काफिरों के लिये प्रयोग किया गया हैं।)_


*कुनूँ मकूक ज़ अत़राफ़ ज़ी तू बिफ़रस्तन्द, ज़ ज़र-ए सुर्ख़ बे ख़रवार ओ पील-ए नर बे क़ितार।*
इस महान विजय के पश्चात अब चारों दिशाओं से तुम्हारे पास मकूक (नजराने या लगान) भेजे जाएँगे—शुद्ध लाल सोने के घोड़ों पर लदे हुये (ख़रवारों) और लदे हुये नर हाथियों की कतारों में।


*चू पील जमअ शवद, पीलख़ानह कुन क़नौज, बे पीलबानी-ए पीलानत जन्दरा बगुमार।*
जब हाथी एकत्र हो जाएँ, तो कन्नौज में हाथियों का अस्तबल बना दो; और अपने हाथियों की देखभाल के लिए जन्दरा को नियुक्त करो। 
_[जन्दरा कोई चन्दर नाम से हिन्दु व्यक्ति लग रहा हैं, चन्दरदेव (1089-1103) गहड़वालों के पहले राजा थे, क्योंकि इनका काल बिल्कुल इस हमले के करीब हैं, हो सकता हैं कि चन्दरदेव को सैफुल्लाह ने ही नियुक्त किया हो, और चन्दरदेव कन्नौज में सैफुल्लाह महमूद के सामन्त हो, अगर ऐसा हैं तो यह बहुत रोचक बात हैं और चौंकाने वाली भी हैं कि गहड़वाल शुरूआत में गजनी के आधीन सामन्त थे।]_



~ @TheGreatHistoryofHumanity

Comments

Popular Posts