MASUD SAD SALMAN (POET) 1040-1115 CE ABOUT INDIA AND HINDUS

 

गजनी के फारसी कवि मसूद साद सलमान (1040-1115) का भारत और हिन्दुओं के प्रति नजरिया


मसूद साद सलमान (1040-1115 ईसवी) एक गजनवी कालीन फारसी दरबारी कवि था, इसका जन्म गजनी के अधिकार वाले लाहौर में हुआ था। इसने कम से कम दो गजनी शासकों की छत्रोछाया में अपनी मसनवियाँ और कसीदे लिखे थे। जिनमें सुल्तान इब्राहीम गजनवी (1060-1095) और उसके  पुत्र सुल्तान मसूद तृतीय (1095-1125) हैं। इतने लम्बे समय के दौरान मसूद साद ने अनेकों सैन्य कमान्डरों और राजाओं, राजकुमारों के ऊपर भी कृतियाँ लिखी थी। उसने गजनवी शासकों के भारत अभियानों में भी शिरकत की थी और कईयों का आँखों देखा हाल अपने विभिन्न कसीदों और फतेहनामों में लिखा हैं।

यहाँ मसूद के द्वारा भारत के विषय में लिखे गये कुछ छन्द दिये गये हैं, इन्हें पढ़कर आप तत्कालीन मुस्लिम तुर्की समाज में हिन्दुओं के प्रति सोच और घृणा की भावना के स्वंय दर्शन कर सकते हैं।


1)

برهمنی که به زنار بود نازش او / ز بیم تیغ تو می بگسلد ز تن زنار**

*बरहमनी कि ब ज़न्नार बूद नाज़िश ओ / ज़ बीम-ए तीघ-ए तू मी बुगुस्लद ज़ तन ज़न्नार*

वह ब्राह्मण जिसे अपने जनेऊ (ज़न्नार) पर बड़ा गर्व होता है, आपकी तलवार के डर से अपने शरीर से वह जनेऊ खुद ही तोड़कर फेंक देता है।


2)

وگرنه هیبت آن تیغ اژدها پیکر / کند به ساعت زنار بر میانش مار

*व गरना हैबत-ए आँ तीघ-ए अजदहा-पैकर / कुनद ब साअत ज़न्नार बर मियानश मार*

नहीं तो आपकी उस अजदहा (ड्रैगन) जैसी भयानक तलवार की धमक पलक झपकते ही उसकी कमर के जनेऊ को ज़हरीला सांप बना देगी।


3)

بتخانها بسوز و بتان را نگون فکن / در کارزار بر دشمنان کار زار کن

*बुत-खाना-हा बसोज़ ओ बुतान रा निगूँ फकन / दर कारज़ार बर दुश्मनान कार-ए ज़ार कुन*

बुतखानों (मूर्तिकारों के ठिकानों) को जला दो और मूर्तियों को उल्टा गिरा दो, युद्ध के मैदान में शत्रुओं के लिए स्थिति अत्यंत दयनीय (कार-ए ज़ार) कर दो।


4)

گر تخم فتح خواهی کشتن به بوم هند / خون ران و دشت ها همه پر جویبار کن

*गर तुख्म-ए फतह ख्वाही कश्तन ब-ए बूम-ए हिन्द / ख़ून रान व दश्त-हा हमे पुर-ए जूयबार कुन*

यदि तुम हिंदुस्तान की धरती पर विजय का बीज बोना चाहते हो, तो रक्त बहाओ और सारे मैदानों को खून के प्रवाह से भर दो।


5)

خون خوردنست خوی تو گرت آرزو کند / تا خون خوری شبیخون بر گنگبار کن

*खून खुर्दन-स्त खूय-ए तू गरत आरज़ू कुनद / ता खून खोरी शबीखूँ बर गंगबार कुन*

रक्त पीना ही तुम्हारा स्वभाव है, यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है, तो रक्त पीने के लिए गंगबार (गंगा जमुना का तराई क्षेत्र) पर अचानक रात का हमला (शबीखूँ) बोल दो।


6)

از بیخ و اصل بتکده گنگ را بکن / آنگاه قصد بتکده قندهار کن

*अज़ बीख ओ अस्ल-ए बुत-कदा-ए गंग रा बकन / आँगाह क़स्द-ए बुतकदे-ए कंदहार कुन*

गंगा के मन्दिरों(बुतखाने) को जड़ और मूल से उखाड़ फेंको, और उसके बाद कंधहार के मन्दिरों (बुतखाने की ओर अपना इरादा मोड़ो। 

_[यहाँ बताया गया हैं कि गजनवी के काल में पूरा अफगानिस्तान मुस्लिम नहीं बना था, बल्कि कन्धहार में बौद्ध, हिन्दु और मानी समुदाय के लोग अभी भी रह रहे थे, और कवि गजनी सुल्तान से विनती कर रहा हैं कि गंगा के किनारे मन्दिरों को नष्ट करने के बाद अगला हमला कन्धार के मन्दिरों पर करो।]_


7)

ای تیغ جانشکاری و وقت شکار تست / جانها ز بت پرستان یکسر شکار کن

*ऐ तीघ-ए जान-शिकारी ओ वक्त-ए शिकार-स्ट / जान-हा ज़ बुत-परस्तान यक-सर शिकार कुन*

हे प्राणों का शिकार करने वाली तलवार! यह तुम्हारे शिकार का समय है, मूर्तिपूजकों के प्राणों को एक-एक करके पूरी तरह अपना शिकार बना लो।


8)

ای آبدار تیغ به هند آتشی فروز / آفاق جمله پر ز دخان و شرار کن

*ऐ आबदार तेग ब हिन्द आतिशी फिरोज़ / आफाक जुमला पुर ए-दुखान ओ शरार कुन*

हे धारदार (आबदार) तलवार! हिंदुस्तान में एक ऐसी आग प्रज्वलित कर दे, जो सारे क्षितिज (आफाक) को धुएँ और चिनगारियों से भर दे।


9)

ناورد کرد خواهد رخش ملک به رزم / سرمای بت پرستان پیشش نثار کن

*नावर्द कर्द ख़्वाहद रुख़्श-ए-मुल्क बह रज़्म / सरमाय-ए बुतपरस्ताँ पेशश निसार कुन*

राज्य का घोड़ा (रक्श) युद्ध में पराक्रम दिखाने वाला है, (इसलिए) मूर्तिपूजकों के कटे हुए सिरों को उसके आगे लाकर न्यौछावर कर दो।


10)

اوباش را نباشد نزدیک او محل / مغز سر سران ویلان اختیار کن

*ओबाश रा नबाशद नज़दीक-ए ऊ महल / मग़्ज़-ए सर-ए सरान-ए वीलान इख़्तियार कुन*

तुच्छ और नीच लोगों के लिए उसके समीप कोई स्थान नहीं है, (इसलिए) विद्रोही सरदारों के सिर के भेजे (मस्तिष्क) को ही अपना निशाना (इख्तियार) बनाओ।


11)

ای مار زخم دیده مارست گوهرت / از زخم کام جان عدو کام مار کن

*ऐ मार-ए ज़ख्म-दीदा मार-स्ट गौहरत / अज़ ज़ख्म-ए काम-ए जान-ए अदु काम-ए मार कुन*

हे घाव खाए हुए साँप! तुम्हारी प्रकृति ही साँप जैसी है, शत्रु की आत्मा के मुँह पर अपने प्रहार से उसे साँप का डंक (काम-ए मार) बना दो।


12)

 سر سلاطین سلطان تاجور مسعود / که چرخ دارد بر حکم او به طوع مدار

*सर-ए सलातीन सुलतान-ए ताजवर मसूद / कि चर्ख़ दारद बर हुक्म-ए ऊ बह तौ ए मदार*

सुल्तानों के सिरताज, मुकुटधारी सुल्तान मसूद, जिनके आदेश पर यह आसमान स्वेच्छा से चक्कर लगाता है।


13)

بیش به هندستان از غزو تو / نه تن بت ماند نه جان شمن

*बीश ब हिन्दोस्तान अज़ ग़ज़्व-ए तू / न तन-ए बुत मानद न जान-ए शमन*

हिंदुस्तान में आपके जिहाद (गजवा) के बाद न तो किसी मूर्ति (बुत) का शरीर सुरक्षित रहा और न ही किसी श्रवण (बौद्ध भिक्षु/शमन) के प्राण बचे। 

_[ध्यान देने योग्य यह हैं कि बौद्ध भिक्षु या शमनों का खात्मा अफगानिस्तान में गजनवी सेना बड़े तादाद में कर रही थी।]_


14)

*ज़मीन-ए हिन्द चुना शुद कि ता बे हश्र बर ऊ, ज़ ख़ून बे कश्ती बायद गुज़ाश्त राहगुज़ार।*

हिन्द की धरती ऐसी हो गई कि क़यामत तक उस पर राहगीर को रक्त के समुद्र को नाव द्वारा पार करना पड़ेगा। _[भारत की धरती पर इतना खून बहा दिया हैं कि वहाँ के राहगीरों को बहुत लम्बे समय तक इस खून की बाढ़ को नाव से पार करना पड़ेगा]_


16)

*बे बहर ओ कोह ज़ बस ख़ून कि राँद तेग़-ए तू शुद, अक़ीक़ ओ बसद दर यमीन ओ ज़र-ए अय्यार।*

समुद्र और पर्वतों तक तुम्हारी तलवार ने इतना रक्त बहाया कि मानो चारों ओर रक्ताभ मणि(अक़ीक़) और लाल मूंगा(बसद) तथा शुद्ध सोना बिखरा पड़ा हो।


17)

*हर आँचे कुनूँ अन्दर ज़मीन-ए ऊ रूयद, चू शाख़ ओ क़वाक़ अज़ शाख़-ए ऊ सरआयद बार।*

अब उसकी भूमि में जो कुछ भी उगेगा, वह शाखाओं और फलों की तरह उसी से उत्पन्न होकर फल देगा। 

_[ये बेहद कठिन पंक्तियाँ हैं कवि के अनुसार इतनी मारकाट के बाद अब जो भी नये लोग आयेंगे या होंगे वे इस्लाम में दीक्षित होंगे और इस प्रकार काफिरों की इस धरती को इस्लाम के फल-फूलों से समृद्ध कर देंगे।]_

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