WOOTZ STEEL INDIA IN ARAB
*भारतीय रोमज/वज्र (उरुक) धातु की पूरी दुनिया में धमक*
*(Indian Wootz Steel and the world)*
पूरे विश्व में दमिश्क स्टील के नाम से विख्यात, सबसे कठोर और धारदार लोहे की तलवारे यूरोपीय क्रूसेडरों की धारणा के अनुसार दमिश्क के आसपास के लोहे की खानों से बनायी जाती थी। ये तलवारे इतनी खतरनाक होती थी कि हवा में उड़ते हुये हल्के से पंख या बाल को, हवा में ही दो हिस्सों में काट ड़ालती थी। दरअसल यह केवल एक मुहावरा नहीं था, बल्कि तलवार की असली ताकत को जाँचने का तरीका भी था। एक तो बेहद धारदार तलवारे और ऊपर से क्रान्तिकारी वक्राकार डिजायन, ये तलवारे हल्के से हाथ के झटके को भी गहरे कट में बदल देती थी, इसलिये इसे केवल एक हाथ में पकड़ा जाता था, भारतीय मूँठ केवल एक हाथ के लिये ही होती हैं। जबकि यूरोपीय ईसाई भारी भरकम लोहे की लोंग स्वार्ड इस्तेमाल करते थे, यह काफी भारी होती थी और दो हाथों से पकड़ी जाती थी। ऐसा मेरा अनुमान हैं कि इस भारतीय वज्र/रोमक लोहे की बनी तलवारे यूरोपीयनों क्रूसेडरों को अच्छा खासा नुकसान पहुँचाती होगी, उन्हें बेहद गहरे घाव देती होगी।
हाल की वैज्ञानिक खोजों से यह बात पता चली हैं कि दमिश्क के आसपास ऐसी कोई लोहे की खदान नहीं थी, यह विशेष प्रकार का स्टील दक्षिण भारत के कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा गुजरात से इम्पोर्ट की जाती थी। लेकिन गजब की बात ही हैं कि अरबी लोगों ने पूरे क्रूसेड़ काल के दौरान यूरोपीयन लोगों को इस भारतीय स्टील की खबर नहीं लगने थी। उन्होने बेहद सजगता और चालाकी से भारतीय स्टील का राज क्रूसेडरों के हाथ नहीं जाने दिया था। क्रूसेडरों के लिये ये तलवारे बहुत कीमती तोहफा हुआ करती थी, और अक्सर युद्ध में जिहादियों को हराने के बाद क्रूसेड़र उनकी तलवारे ले लिया करते थे। ये तलवारे अक्सर वे अपने गृहराज्यों में राजाओं और कुलीनों को भेंट करते थे, और अक्सर इनका उद्गम पूछे जाने पर वे *दमिश्क तलवारे* कहते । इनकी धार पर पानी की लहरों (जौहर) जैसे पैटर्न वाली ये खास तलवारे जो जंग रोधी और बेहद मजबूत थी, पूरे यूरोप में अरबी या दमिश्क तलवारों के रूप में विख्यात हो गयी, जो आज भी दमिश्क स्टील ही कही जाती हैं। अरबियों ने भारत से जो कुछ भी लेकर यूरोप वालों को दिया, उस पर हमेशा सोची समझी रणनीति के तहत अरबी ब्रान्डिंग और पर्ची चिपका दी गयी। केवल चाय को छोड़ दिया जाये तो बाकि सब के नाम अरबी रखे हैं, भारतीय गिनती अरबियों ने पूरे यूरोप में अरेबिक न्यूमेरल के नाम से चला दी जो आज भी उसी नाम से जानी जाती हैं। भारत के गुरत्व, घूर्णन और सौर कक्षा वाले सिद्धान्त अरबी बताकर यूरोपीयनों को चिपका दिये।
अभी तक हमारी जानकारी यह थी कि अरबी भारत से भारी मात्रा में भारतीय स्टील आयात करते थे, जिसे दक्षिण भारत में ऊरक्कू स्टील कहा जाता था, उत्तर में रोमक या वज्र कहा जाता था। लेकिन निम्न लिखित अरबी कवि की पंक्ति से यह पता चलता हैं कि भारतीय स्टील की तलवारें भी सीधे तौर पर निर्यात करते थे। मुझे तत्कालीन कुछ भारतीय अपभ्रन्श और फारसी ग्रन्थ मिले हैं जिनमें भारत में निर्माण होने वाली अलग अलग प्रकार की तलवारों के नाम दिये गये हैं। _करतारि और तरवारि_ शब्द मुस्लिम काल से पहले से ही चला आ रहा था। निःसन्देह ये दो प्रकारी की तलवारे भारत में दसवीं सदी से पहले चलती थी लेकिन इसके अलावा और भी नामकरण थे। उन ग्नन्थों के अध्ययन से यह बात और भी स्पष्ट होने की उम्मीद हैं। और यदि यह सच हैं कि अरब में तलवारे भारत से जाती थी तो फिर ये वक्रकार तलवारों की तकनीक भी भारतीय ही हैं, _(जिसका श्रेय विद्वान तुर्कों के देते हैं, जबकि हमारे यहाँ तो ईसा की पहली सदी से ही मूर्तियों के रूप में प्रमाण मिल रहे हैं)_ क्योंकि सबसे बड़ी बात यह हैं कि केवल भारतीय इस्पात की ईटे पा जाने से भी अरबी उतनी उच्च गुणवत्ता वाली तलवारों की निर्माण नहीं कर सकते थे, तलवार को आगे से वज्र की तरह कठोर और पीछे से मुलायम लचीला रखा जाता हैं इसके लिये दोनों ही तरफ अलग-अलग तापमान का ट्रीटमेन्ट देना होता हैं, जापानियों ने अपनी कटाना के लिये एक विशेष प्रकार की पद्धति तैयार की हैं जिसमें वे हीट से बचाने हेतु कटाना के पिछले हिस्से पर गीली मिट्टी का लेप लगाते हैं, यह मिट्टी भट्टी की गर्मी को सोख लेती हैं, कुछ अन्य तरीकों में भारतीय तलवार को रेत में दबाते थे, हालांकि तकनीकि पर चर्चा किसी अलग लेख में करेंगे फिलहाल मुस्लिम राज्यों में भारतीय तलवारों की धाक के उदाहरण देख लेते हैं। भारतीय तलवारों से जोरदार वार करने के बाद भी तलवार को कोई नुकसान नहीं पहुँचता न ही धार टूटती थी, न मुडती थी और न ही धार कमजोर पड़ती थी। इसलिये न केवल रोमज लोहा (वुटज स्टील) भारतीय था, बल्कि इस तलवार को बनाने की उच्चकोटि की तकनीकि भी भारतीय ही थी।। क्योंकि भारतीय दमिश्क स्टील की तलवारों को अरबी लोग सैफ-उल-हिन्दिय्या या मुहन्नद कहते थे। ये बड़े टेक्नीकल नाम हैं। मुहन्नद का शाब्दिक अर्थ हैं भारत में उत्तम फौलाद से बनी तलवार
*अरबी लेखको, कवियों की रचनाओं में बार-बार भारत की तलवारों की जिक्र आता हैं, उनमें से कुछ का संग्रह आपकी जानकारी के लिये प्रस्तुत हैं।*
*कवि का नामः* अबू अल तैय्यब अल-मुतनब्बी,
*कालः* 950 ईसवी,
*निवासः* अलेप्पो,
*दरबारी कवि शासक का नामः* सैफ अल-दौला
*कविता कोशः* दीवान-अल-मुतनब्बी
*स्वंय गवाह रहेः* रोमन बिजेन्टाईन साम्राज्य और जेरूसलेम को लेकर आरम्भिक क्रूसेड के..
यहाँ अल-मुतनब्बी के इस प्रसिद्ध क़सीदे के शुरुआती और सबसे मुख्य मूल अरबी शेर दिए गए हैं, जिनमें आत्मसम्मान, जीवन के दर्शन और भारतीय तलवार (अल-हिन्द/मुहन्नद) का ज़िक्र है। साथ ही इसका देवनागरी लिप्यंतरण भी प्रस्तुत है:
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1:
كَفَى بِكَ دَاءً أَنْ تَرَى المَوْتَ شَافِيَا ... وَحَسْبُ المَنَايَا أَنْ يَكُنَّ أَمَانِيَا
_"कफ़ा बिका दाअन् अन तरल मवता शाफ़िया ... व हस्बुल मनाया अन यकुन्ना अमानिया"_
*यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बीमारी है कि तुम्हें मौत ही हर दर्द का इलाज दिखने लगे; और दुखों की इंतहा यह है कि मौत ही तुम्हारी आखिरी तमन्ना बन जाए।*
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2:
فَلا تَقْبَلَنَّ المَيْمَنَاتِ وَلا الهِنْدَا ... إِذَا أَنْتَ لَمْ تَطْعَنُ بَيْنَ المَيْمَنَاتِ
_"फ़ला तक़्बलन्नल मयमनाति व लल हिन्दन् ... इज़ा अन्ता लम तत'अन बैनल मयमनाति"_
*यदि तुम युद्ध के मैदान में सेना की टुकड़ियों के बीच घुसकर वार करने का दम नहीं रखते, तो तुम्हारे लिए न तो सेना के ऊंचे पदों का कोई मोल है और न ही उस 'हिन्द' (भारत की मशहूर फौलादी तलवार) को हाथ में उठाने का कोई हक है।*
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3:
إِذَا فَلَّ عَزْمِي عَنْ مَضَاءِ مُهَنَّدٍ ... فَمَا اخْتَرْتُ إِلاَّ الصَّارِمَاتِ المَوَاضِيَا
_"इज़ा फ़ल्ला अज़्मी अन मज़ाए मुहन्नदिन् ... फ़मा ख़्तर्तु इल्लस सारिमातिल मवाज़िया"_
*अगर मेरा पक्का इरादा ही एक चमचमाती भारतीय तलवार (मुहन्नद) की धार की तरह पैना न रहे, तो फिर मेरे लिए दुनिया की बेहतरीन और तेज़ तलवारें चुनने का भला क्या फ़ायदा?*
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4:
تَمْشِي الكِرَامُ عَلَى آثَارِ خَيْلِهِِمِ ... وَتَلْمَعُ الهِنْدُ فِي أَيْدِي الكُمَاةِ بَهَا
_"तमशिल किरामू अला आथ़ारी ख़ैलिहिमु ... व तलमाउल हिन्दु फ़ी अैदिल कुमाति ब्हा"_
*"महान योद्धा उनके घोड़ों के पैरों के निशानों पर चलते हैं, और उनके शूरवीरों के हाथों में 'अल-हिन्द' (भारतीय तलवारें) अपनी पूरी चमक के साथ कौंधती हैं।"*
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5: मुतनब्बी से भी सदियों पहले, छठी शताब्दी के अरब के सबसे महान योद्धा-कवि अंतरा इब्न शद्दाद ने अपनी प्रेमिका 'अब्ला' को याद करते हुए युद्ध के मैदान का वर्णन किया था। यह शेर अरबी साहित्य के सबसे प्रसिद्ध शेरों में गिना जाता है:
وَلَقَدْ ذَكَرْتُكِ وَالرِّمَاحُ نَوَاهِلٌ ... مِنِّي وَبِيْضُ الْهِنْدِ تَقْطُرُ مِنْ دَمِي
_"व लक़द ज़करतुक व रिमाहु नवा हिलुन ... मिन्नी व बीज़ुल हिन्द-इ तक़तुरु मिन दमी"_
*"जब (दुश्मनों के) भाले मेरा खून पीने को उतावले थे और मेरे जिस्म से 'बीज़ुल हिन्द' (चमचमाती सफ़ेद भारतीय तलवारें) खून टपका रही थीं, उस भीषण युद्ध के बीच भी (हे अब्ला!) मुझे सिर्फ तुम्हारी याद आ रही थी।"*
6:
فَوَدَدتُ تَقبيلَ السُيوفِ لأَنَّها ... لَمَعَت كَبارِقِ ثَغرِكِ المُتَبَسِّمِ
_फ़-वदद्तु तक़्बीलस सुयूफ़ि लि-अन्नहा ... लमअत क-बारिक़ि थ़ग्रिकिल मुतबस्सिमी"_
और मेरा मन उन तलवारों को चूमने का हुआ, क्योंकि उनकी चमक तुम्हारी उस मुस्कान जैसी थी जिसके पीछे सुंदर दांत चमकते हैं।"
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7:
पैगंबर मुहम्मद के समकालीन कवि काब इब्न ज़ुहैर (Ka'b ibn Zuhayr) ने पैगंबर मुहम्मद की शान में अपना सबसे प्रसिद्ध क़सीदा "बानत सुआद" (Banat Su'ad) पढ़ा, तो उन्होंने पैगंबर को अल्लाह का ऐसा नूर (प्रकाश) कहा जो भारतीय तलवार की तरह अचूक है। इस शेर से खुश होकर पैगंबर ने उन्हें अपनी चादर (बुर्दा) इनाम में दी थी:
إِنَّ الرَّسُولَ لَنُورٌ يُسْتَضَاءُ بِهِ ... مُهَنَّدٌ مِنْ سُيُوفِ اللَّهِ مَسْلُولُ
_"इन्नर रसूला ल-नूरुन युस्तज़ाउ बिही ... मुहन्नदुन मिन सुयूफ़िल्लाहि मस्लूलु"_
*"बेशक, अल्लाह के रसूल (मुहम्मद) एक ऐसा प्रकाश स्तंभ हैं जिससे पूरी दुनिया रौशन है; वे अल्लाह की तलवारों में से म्यान से खींची गई एक 'मुहन्नद' (बेहतरीन भारतीय तलवार) हैं।"*
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8:
9वीं शताब्दी के महान अरब दार्शनिक और वैज्ञानिक याकूब इब्न इसहाक अल-किंदी ने तलवारों पर एक पूरा वैज्ञानिक शोधग्रंथ लिखा था, जिसका नाम था: 'रिसाला फ़ी अनवा अल-सुयूफ़ अल-अतीक़ा' (पुराने ज़माने की तलवारों के प्रकारों पर निबंध)।
अल-किंदी ने दुनिया भर की तलवारों का वर्गीकरण करते हुए लिखा कि पूरी दुनिया में 'अल-हातीफ़ अल-हिन्दी' (भारतीय फौलाद) सबसे उत्तम है। उन्होंने वर्णन किया कि भारतीय कारीगर लोहे को इस तरह पिघलाते हैं कि तलवार की धातु में एक प्राकृतिक _'अक्स' या 'जौहर' (क्रिस्टल पैटर्न)_ आ जाता है, जो इसे बिना टूटे लोहे की बख्तरबंद गाड़ियों को भी काटने की ताकत देता है। "ढली हुई लोहे की तलवारों में सबसे सर्वश्रेष्ठ भारत की तलवारें (अल-हिन्दिय्या) हैं। ये दो श्रेणियों की होती हैं: पहली जो सीधे भारत में पिघलाए गए लोहे के अयस्क (अल-हदीद अल-अनीक़) से बनती हैं, और दूसरी जो हिंद महासागर के व्यापार मार्ग से आयात किए गए फौलाद के पिंडों (Ingots) से बनाई जाती हैं। इनमें एक प्राकृतिक तैरता हुआ लहरदार पैटर्न (फ़िरिंद या जौहर) होता है, जो रोशनी के सामने रखने पर पानी की लहरों की तरह चमकता है। दुनिया का कोई भी दूसरा लोहा भारतीय धार के पैनेपन और बिना टूटे लोहे के बख्तरबंद को भी काट देने की इसकी क्षमता की बराबरी नहीं कर सकता।"
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9:
कवि अल-ख़ंसा (7वीं शताब्दी की महान कवयित्री) अपने भाई 'सख्र' की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए उन्होंने उसकी वीरता को याद किया और उसकी तुलना चमचमाती भारतीय तलवार से की:
وَإِنَّ صَخْراً لَوَالِيَنَا وَسَيِّدُنَا ... وَإِنَّ صَخْراً إِذَا نَشْتُو لَنَحَّارُ
وَإِنَّ صَخْراً لَمِقْدَامٌ إِذَا رَكِبُوا ... كَأَنَّهُ سَيْفُ هِنْدٍ حِينَ يَطَّارُ
_व इन्ना सख़्रन ल-वालियुना व सय्यिदुना... व इन्ना सख़्रन इज़ा नश्तू ल-नह्यारू"_
_"व इन्ना सख़्रन ल-मिक़दामुन् इज़ा रकिबू... क-अन्नहू सैफ़ु हिन्दिन हीना यत्तयारू"_
*बेशक सख्र हमारा रक्षक और हमारा सरदार था, और सर्दियों में जब कमी होती तो वह दिल खोलकर खिलाता था। जब वे घोड़ों पर सवार होते, तो वह सबसे आगे बढ़कर नेतृत्व करता था, मानो वह म्यान से खींची गई कोई 'सैफ़-ए-हिन्द' (भारतीय तलवार) हो।"*
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10:
अल-इदरीसी (12वीं शताब्दी ईस्वी) – 'नुज़हत अल-मुश्ताक़ फी इख़्तिराक़ अल-आफ़ाक़' - प्रसिद्ध मोरक्कन अरब भूगोलवेत्ता ने लोहे के निर्माण में भारतीय कारीगरों के एकाधिकार और श्रेष्ठता के बारे में लिखा था:
وَأَهْلُ الهِنْدِ مَشْهُورُونَ بِصِنَاعَةِ الحَدِيدِ، وَلَا يُوجَدُ شَيْءٌ يَفُوقُ حِدَّةَ الحَدِيدِ الهِنْدُوَانِيِّ، وَلَهُمْ صَنَائِعُ تُصْنَعُ فِيهَا السُّيُوفُ الهِنْدِيَّةُ الَّتِي لَا تَقُومُ لَهَا الدُّرُوعُ."
_"व-अहलुल हिन्द-इ मश्हूरू-न बि-सिनाअ़तिल हदीद-इ, व ला यू-जदु शय-उं यफ़ूक़ु हि़द्दतल हदीदिल हिन्दुवानिय्यि, व लहुम सना-इ़'उ तुस्नअ़ु फ़ीहस् सुयूफ़ुल हिन्दिय्यतुल्लती ला तक़ूमु लहाद् दुरुअ़्।"_
*"भारत के निवासी लोहे के निर्माण में अत्यधिक कुशल हैं, और भारतीय फौलाद (हिंदुवानी) के पैनेपन और श्रेष्ठता को पार कर सके, ऐसा कुछ भी ढूंढ पाना असंभव है। उनके पास ऐसी कार्यशालाएँ (वर्कशॉप) हैं जहाँ दुनिया के सबसे प्रसिद्ध सुयूफ (वक्र तलवारें) ढाले जाते हैं, जिनका कोई भी कवच सामना नहीं कर सकता।"*
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11:
इमरु अल-क़ैस (6ठी शताब्दी ईस्वी) – मुअल्लाक़ात के महान सम्राट-कवि, इस्लाम के आगमन से बहुत पहले, शास्त्रीय अरबी कविता के जनक माने जाने वाले इस कवि ने पूर्णता और अंतिम न्याय के प्रतीक के रूप में भारतीय तलवार को एक मानदंड के रूप में इस्तेमाल किया:
مَشُوفٌ كَبَقْـعِ الأُرْجُـوَانِ مُطَـرَّزٌ ... بِسَيْفٍ مِنَ الْهِنْدِ الْحُسَامِ الْمُهَنَّدِ
_"मशूफ़ुन क-बक़्'इल उरजुवानि मुतर्रज़ुन ... बि-सैफ़िन मिनल हिन्द-इल् हुसामि-ल् मुहनन्दि"_
*"वह वीर योद्धा (युद्धभूमि में) गहरे लाल रंग के बेल-बूटों से कढ़ाई किए हुए वस्त्र की तरह रक्त से सुशोभित था, मानो वह हिन्द (भारत) की वह चमचमाती हुसाम (दुश्मन के वार को काटने वाली) और मुहन्नद (भारतीय फौलादी तलवार) हो।"*
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12:
इमाम अल-ग़ज़ाली (11वीं शताब्दी ईस्वी) – 'अल-मक़सद अल-अस्ना फ़ी शर्ह अस्मा अल्लाह अल-हुस्ना' (المقصد الأسنى في شرح أسماء الله الحسنى) दार्शनिक इस्लामिक धर्मशास्त्र और दर्शन में भी, शब्दों की सटीकता के लिए भारतीय फौलाद को ही सबसे बड़ा पैमाना माना जाता था। ईश्वर के 99 नामों की अपनी व्याख्या में, इमाम अल-ग़ज़ाली लिखते हैं:
فإنَّ قَوْلَ قَائِلٍ: ’الصَّارِمُ‘ يُفْهَمُ مِنْهُ السَّيْفُ، وَلَكِنَّ قَوْلَهُ: ’المُهَنَّدُ‘ يُعْطِي كَمَالَ مَعْنَى السَّيْفِيَّةِ."
_"फ़-इन्ना क़ौलो क़ा-इलिन: 'अस्-सारिमु' युफ़्हमु मिन्हुस्-सैफ़ु, व लाकिन्ना क़ौलहू: 'अल्-मुहन्नदु' यु'ती कमाला मा'नस्-सैफ़िय्यति।"_
*"जब कोई व्यक्ति 'काटने वाली वस्तु' (अल-सारिम) कहता है, तो उसका तात्पर्य किसी भी सामान्य तलवार से हो सकता है; लेकिन जब वह 'भारतीय फौलाद से बनी तलवार' (अल-मुहन्नद) कहता है, तो वह उस परम और अंतिम आदर्श को परिभाषित करता है कि वास्तव में एक तलवार क्या होती है।"*
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13:
फारसी साम्राज्य में भारतीय तलवारों की गुणवत्ता ने एक प्रसिद्ध मुहावरे को जन्म दिया जो आज भी प्रचलित है— "जवाब-ए-हिन्दी" (भारतीय उत्तर)। इसका अर्थ होता है किसी को अपनी भारतीय तलवार की धार से ऐसा करारा और अंतिम उत्तर देना कि उसके बाद कोई बहस न बचे। फ़िरदौसी (Ferdowsi) द्वारा रचित *फारसी* महाकाव्य शाहनामा (Shahnameh) में रुस्तम की वीरता और उसके अस्त्र-शस्त्रों के संदर्भ में भारतीय तलवार का जिक्र किया हैं। याद रहे कि यह ग्रन्थ महमूद गजनवी के दरबार में लिखा गया था। (1025 CE)
بِگَشتند و بَستند شَمشیرِ هِند ... زِ جَوهَر دِرَخشان چُو دریایِ سِند
_"बिगश्तन्द व बस्तन्द शमशीर-ए-हिन्द ... ज़ि जौहर दरख़्शान चू दरया-ए-सिन्द"_
*"उन्होंने मुड़कर अपनी कमर पर वह लंबी भारतीय तलवार (शमशीर-ए-हिन्द) बांधी, जिसके फौलाद के प्राकृतिक जौहर (लहरदार क्रिस्टल पैटर्न) सिंधु नदी के विशाल पानी की तरंगों की तरह हवा में चमचमा रहे थे।"*
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14:
अल-बिरूनी (10वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी) – 'किताब अल-जमाहिर फी मआरिफ़त अल-जवाहिर' (रत्नों और धातुओं की वृहद् मार्गदर्शिका) में ने धातुओं के अपने अध्याय में भारतीय इस्पात की श्रेष्ठता का तकनीकी विवरण दिया है:
وَلَيْسَ فِي أُمَمِ الأَرْضِ مَنْ هُوَ أَعْلَمُ بِأَصْنَافِ السُّيُوفِ وَأَسْمَاءِ حَدِيدِهَا وَتَصْنِيفِ أَعْرَاضِهَا مِنْ أَهْلِ الهِنْدِ."
_व लै-स फ़ी उममिल्-अर्ज़ि मन् हु-व अ'लमु बि-अस्नाफ़िस्-सुयूफ़ि व अस्मा-इ हदीदिहा व तस्नीफ़ि अ'राज़िहा मिन् अह़्लिल्-हिन्द."_
*"और धरती की तमाम कौमों (राष्ट्रों) में ऐसा कोई भी नहीं है, जो तलवारों की विभिन्न श्रेणियों, उनके फौलाद के नामों और उनकी सतह की बनावट (जौहर) के वर्गीकरण को भारत के निवासियों (भारतीयों) से बेहतर और गहराई से समझता हो।"*
وَأَمَّا الحَدِيدُ التِّلِنْجِيُّ الَّذِي يُجْلَبُ مِنْ أَرْضِ التِّلِنْجِ فِي الهِنْدِ، فَمِنْهُ تُصْنَعُ السُّيُوفُ المُرَنَّفَةُ الَّتِي تَجْمَعُ بَيْنَ اللِّينِ وَاليُبْسِ، فَتَقْطَعُ الدُّرُوعَ وَالقَصَائِلَ كَأَنَّهَا لَمْ تَلْقَ شَيْئًا."
_"व-अम्मल हदीदुत् तिलिंजिय्युल लज़ी युज्लबु मिन अर्ज़ित तिलिंजि फ़िल हिन्द-इ, फ़-मिन्हु तुस्नअ़ुस् सुयूफ़ुल मुरन्नफ़तुल्लती तज्मअ़ु बैनल लीनि वल युब्स-इ, फ़-तक़्तअ़ुद् दुरुअ़ वल क़सा-इ-ल क-अन्नहा लम तल्क़ शय-आ।"_
*और रहा तेलिंगी लोहा (तेलिंगाना का वूट्ज़ फौलाद), जिसे भारत की 'तेलिंग' भूमि से लाया जाता है, तो उससे ऐसी धारदार और लचीली तलवारें (अल-सुयूफ़ अल-मुरन्नफ़ा) ढाली जाती हैं जो कोमलता (लचीलेपन) और कठोरता दोनों गुणों को एक साथ समेटे होती हैं; फिर वे (युद्ध में) ज़िरह-बख्तर (Iron Armor)(कवच) और लोहे की कड़ियों को इस तरह काट देती हैं मानो उनके सामने कोई रुकावट आई ही न हो।*
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15:
इब्न हौक़ल – 10वीं शताब्दी के प्रसिद्ध अरबी यात्री और भूगोलवेत्ता 'सूरत अल-अर्द' (धरती की आकृति) में भारत से अरब और खाड़ी देशों (विशेष रूप से यमन और ओमान) को होने वाले कच्चे फौलाद और तलवारों के व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विवरण दर्ज किया है।
وَمِنْ بِلَادِ الهِنْدِ يُجْلَبُ الحَدِيدُ القَلْعِيُّ وَالهِنْدُوَانِيُّ إِلَى أَسْوَاقِ الفَارِسِ وَاليَمَنِ، وَبِهَا تُصْقَلُ السُّيُوفُ الَّتِي تُنْسَبُ إِلَى اليَمَنِ، وَإِنَّمَا جَوْهَرُهَا وَأَصْلُ مَادَّتِهَا مِنْ حَدِيدِ الهِنْدِ."
_"व-मिन बिलादिल हिन्द-इ युज्लबुल हदीदुल क़ल्'इय्यु वल हिन्दुवानिय्यु इला अस्वक़िल फ़ारिस-इ वल यमनि, व-बिहा तुस्क़लुस सुयूफ़ुल्लती तुन्सबु इलल यमनि, व-इन्नमा जौहरूहा व-अस्लु माद्दतिहा मिन हदीदिल हिन्द।"_
*"और हिन्द (भारत) के देशों से ही वह उत्कृष्ट 'क़लई' लोहा और 'हिंदुवानी' फौलाद (वूट्ज़ स्टील) फारस और यमन के बाज़ारों में आयात (मंगवाया) किया जाता है। और इन्हीं बाज़ारों (यानी यमन की कार्यशालाओं) में उन प्रसिद्ध तलवारों को चमकाकर तैयार किया जाता है जिन्हें (व्यापार में) 'यमनी तलवारें' कहा जाता है; जबकि असलियत यह है कि उनके भीतर का फौलाद (जौहर/क्रिस्टल संरचना) और उनका मूल कच्चा माल विशुद्ध रूप से भारत के लोहे से ही निर्मित होता है।"*
उन्होंने दर्ज किया कि यमन के बाज़ारों में जो 'यमनी तलवारें' अपनी श्रेष्ठता के लिए प्रसिद्ध थीं, वे असल में यमन में नहीं बनती थीं। यमन के व्यापारी भारत से कच्चे फौलाद के पिंड (Ingots/Wootz Blocks) मंगवाते थे और फिर उन्हें यमन में तलवारों का आकार देते थे। मूल फौलाद विशुद्ध रूप से भारतीय था।
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16:
अहमद अल-क़लक़शंदी (14वीं-15वीं शताब्दी ईस्वी) – 'सुब्ह अल-अशा' (प्रशासनिक विश्वकोश) मामलुक साम्राज्य के इस विशाल 14 खंडों के अरबी प्रशासनिक संदर्भ ग्रन्थ में मध्यकालीन युद्ध कला का विवरण है: अल-क़लक़शंदी ने लिखा है कि मिस्र और सीरिया के सुल्तानों के शाही शस्त्रागार (Royal Arsenals) भारतीय हथियारों से भरे हुये हैं।
وَالسُّيُوفُ الهِنْدِيَّةُ وَالرِّمَاحُ المَصْنُوعَةُ مِنْ قَنَا الهِنْدِ هِيَ أَعَزُّ الذَّخَائِرِ المَمْلُوكِيَّةِ فِي الحُرُوبِ."
_"वस्-सुयूफ़ुल-हिन्दिय्यतु वर-रिमाह़ुल-मस्नूअ़तु मिन् क़नल-हिन्दि हिय अअ़ज़्ज़ुज़्-ज़ख़ा-इरिल-ममलूकिय्यति फ़िल-ह़ुरूब."_
*"और वे भारतीय तलवारें (अल-सुयूफ़ अल-हिन्दिया) तथा भारत के विशेष बांस (वर-रिमाह़ुल-मस्नूअ़तु मिन् क़नल-हिन्दि) से बने अचूक भाले, युद्ध के मैदानों में मामलुक सुल्तानों (मिस्त्र) के सबसे मूल्यवान और अनमोल सामरिक खजाने (संपत्ति) हैं।" *
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17:
इब्न मंजूर (13वीं शताब्दी ईस्वी) – 'लिशान अल-अरब' (अरबों की जुबान - सबसे बड़ा अरबी शब्दकोश) में अरबी भाषा के इस सबसे महान और ऐतिहासिक शब्दकोश में 'ह-न-द' (H-N-D) धातु के अंतर्गत लिखा है:
मूल अरबी संज्ञा: "الهِنْدُوانيُّ: المُهَنَّدُ، سيف مصنوع من حديد الهند"
_"अल-हिन्दुवानिय्यु: अल-मुहन्नदु, सैफ़ुन मसनूअ़ुन मिन हदीदिल हिन्द"_
• हिंदी अर्थ: "'हिन्दुवानी' या 'मुहन्नद' का शाब्दिक अर्थ है— वह अचूक तलवार जिसे विशुद्ध रूप से भारत के फौलाद से ढाला गया हो।"
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18:
अबू अल-क़ासिम अल-ज़मख़्शरी (11वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी) – 'असास अल-बलाग़ा' (रंग-रूप और रूपकों का कोष)
يُقَالُ لِلرَّجُلِ البَاسِلِ: عَمْرُو سَيْفٌ هِنْدُوَانِيٌّ مُهَنَّدٌ، إِذَا كَانَ لَا يَنْثَنِي عَزْمُهُ عَنِ القَطْعِ."
_युक़ा-लु लिर-रजुलिल-बासिली: अ़म्रू सैफ़ुन् हिन्दुवानिय्युन् मुहन्नदुन्, इज़ा का-न ला यन्थ़नी अ़ज़्मूहु अ़निल्-क़त्'इ._
*इस भाषावैज्ञानिक ग्रन्थ में वीरता के अलंकारों की व्याख्या करते हुए लिखा गया है:*
• विवरण: जब भी कोई अरब अपनी बहादुरी की कसम खाता है, तो वह अरबी मुहावरे 'सयफ़ुन हिन्दुवानिय्युन व मुहनन्द' का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ होता है "एक ऐसा संकल्प जो भारतीय फौलाद की तरह कभी टूट नहीं सकता।"
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19:
फ़ख़्र-ए-मुदब्बिर (13वीं शताब्दी ईस्वी) – 'आदाब अल-हर्ब वश्-शुजाअत' (युद्ध के नियम और वीरता)= यद्यपि यह ग्रंथ भारत के दिल्ली सल्तनत काल में लिखा गया था, लेकिन इसकी भाषा और सामरिक नियम विशुद्ध इस्लामी-अरबी परंपरा पर आधारित थे:
*विवरण: युद्ध के साजो-सामान का वर्णन करते हुए लेखक ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि एक सेनापति को अपनी अग्रिम पंक्ति (Vanguard) के शूरवीरों को केवल 'हिंदुवानी' फौलाद के कवच और तलवारें देनी चाहिए, क्योंकि जंग के मैदान में जब तुर्क या अरब घोड़ों की आपस में टक्कर होती है, तो केवल भारतीय लोहा ही दूसरे लोहे को काट पाता है, खुद कभी खंडित नहीं होता।*
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20:
तरफ़ा इब्न अल-अब्द (Tarafa ibn al-Abd) – 6ठी शताब्दी (मुअल्लाक़ात) अरब के प्राचीनतम और सबसे प्रसिद्ध सात महाकाव्यों (मुअल्लाक़ात) में शामिल कवि तरफ़ा ने अपने रिश्तेदारों द्वारा दिए गए धोखे और पीड़ा की तुलना भारतीय तलवार के जानलेवा वार से की है:
وَظُلْمُ ذَوِي القُرْبَى أَشَدُّ مَضَاضَةً ... عَلَى المَرْءِ مِنْ وَقْعِ الحُسَامِ المُهَنَّدِ
_व ज़ुल्मु ज़विल क़ुर्बा अशद्दु मज़ॉज़तन् ... अलल मर-इ मिन वक़्'इल हुसामिल मुहन्नदि_
*अपनों और रिश्तेदारों का अन्याय किसी इंसान के दिल पर उससे कहीं अधिक गहरा और असहनीय घाव करता है, जितना कि एक धारदार भारतीय फौलादी तलवार (हुसाम-ए-मुहन्नद) के वार से होता है।*
*समीक्षा:* भारतीय तलवार की अचूक मारक क्षमता को इंसानी दर्द के सर्वोच्च पैमाने के रूप में स्थापित किया गया है।
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21:
अल-जाहिज़ (Al-Jahiz) – 9वीं शताब्दी (फ़ख़्र अल-सूदान अला अल-बीज़ान) प्रसिद्ध अरबी साहित्यकार अल-जाहिज़ ने भारतीयों के युद्ध-शौर्य, अस्त्र-शस्त्र और धातु विज्ञान की खुलकर प्रशंसा की है:
"وَمِنْهُمُ السُّيُوفُ القَلْعِيَّةُ وَالهِنْدِيَّةُ الَّتِي لَا نَظِيرَ لَهَا فِي مَضَائِهَا، وَلَهُمْ صَبْرٌ فِي الحَرْبِ وَشَجَاعَةٌ لَا تُدَانَى."
_"व मिन्हुमुस् सुयूफ़ुल क़ल्'इय्यतु वल हिन्दिय्यतुल्लती ला नज़ी-र लहा फ़ी मज़ा-इहा, व लहुम सब्रुन फ़िल हर्ब-इ व शजाअ़तुन ला तुदाना।"_
*और उन्हीं (भारत) के पास वे प्रसिद्ध भारतीय तलवारें हैं, जिनकी धार और काटने की क्षमता का पूरी दुनिया में कोई मुकाबला नहीं है; और उनके पास युद्ध में अविश्वसनीय धैर्य तथा अद्वितीय वीरता है।*
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22:
अबू तमाम (Abu Tammam) – 9वीं शताब्दी (अमूरिया का विजय-काव्य) खलीफा अल-मुतासिम द्वारा बाइजेंटाइन साम्राज्य के खिलाफ लड़े गए प्रसिद्ध अमूरिया युद्ध के जश्न में अबू तमाम ने लिखा कि किताबों की भविष्यवाणियां झूठी हैं, सच केवल भारतीय तलवार की धार लिखती है:
السَّيْفُ أَصْدَقُ أَنْبَاءً مِنَ الكُتُبِ ... فِي حَدِّهِ الحَدُّ بَيْنَ الجِدِّ وَاللَّعِبِ بِيضُ الصَّفَائِحِ لَا سُودُ الصَّحَائِفِ فِي ... مُتُونِهِنَّ جَلَاءُ الشَّكِّ وَالرِّيَبِ
_अस्-सैफ़ु असदक़ु अम्बा-अन् मिनल कुतुबि ... फ़ी ह़द्दिहिल ह़द्दु बैनल जिद्दि वल ल'इबि" "बीज़ुस सफ़ा-इहि ला सूदुस सहा-इफ़ि फ़ी ... मुतूनिहिन्ना जला-उश शक्कि वर रियबि"_
*किताबों (ज्योतिषियों) की भविष्यवाणियों से कहीं अधिक सच तो तलवार बयां करती है; इसकी धार ही तय करती है कि क्या सच है और क्या खेल। (काले अक्षरों वाली) स्याही की किताबें नहीं, बल्कि सफेद चमचमाती भारतीय तलवारों (बीज़ुस सफ़ाइह) की चमक ही मन के सारे संशय और भ्रम को मिटाती है।*
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23:
अल-किंदी (Al-Kindi) – रिसाला फी अनवा अल-सुयूफ़ यद्यपि अल-किंदी ने भारतीय इस्पात की तारीफ की, लेकिन उन्होंने इसकी व्यावहारिक कमियों और दोषों पर भी स्पष्ट तकनीकी टिप्पणी की है:
"وَفِي بَعْضِ حَدِيدِ الهِنْدِ عَيْبٌ؛ فَإِنَّهُ يَكُونُ شَدِيدَ اليُبْسِ سَرِيعَ الكَسْرِ إِذَا أَصَابَهُ بَرْدٌ شَدِيدٌ، أَوْ إِذَا ضَرَبَ صَفْحَةً صُلْبَةً بِغَيْرِ حِذْقٍ."
_"व फ़ी बा'ज़ि हदीदिल हिन्द-इ अ़ैबुन; फ़-इन्नहू यकूनु शदीदल युब्स-इ सरीअ़ल कस्र-इ इज़ा असाबहू बर्दुन शदीदुन, औ इज़ा ज़-र-ब सफ़्ह़तन सुल्बतन बि-ग़ैरि हिज़क़िन।"_
*"और भारत के कुछ लोहे (इस्पात) में एक दोष भी होता है; इसमें अत्यधिक कठोरता (Brittle Hardness) होती है, जिसके कारण यदि इस पर कड़ाके की ठंड पड़ जाए या बिना कुशलता के किसी बहुत सख्त सतह पर वार किया जाए, तो इसके अचानक टूटने का खतरा रहता है।"*
• समीक्षा: बहुत अधिक कार्बन (High Carbon Content) होने के कारण शून्य से नीचे के तापमान पर वूट्ज़ स्टील चटक सकता था, जिसे अरब धातुविज्ञानी एक कमी मानते थे।
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24:
अल-जाहिज़ – मनाक़िब अल-तुर्क (तुर्कों के गुण) युद्ध नीतियों की तुलना करते हुए अल-जाहिज़ ने भारतीयों के साजो-सामान और युद्ध-शैली की कमज़ोरी को रेखांकित किया:
"وَالهِنْدُ أَهْلُ صَبْرٍ وَعُدَّةٍ ثَقِيلَةٍ، وَلَكِنَّهُمْ يُؤْتَوْنَ مِنْ قِلَّةِ الخِفَّةِ، فَلَيْسَ لَهُمْ كَرٌّ وَفَرٌّ كَفُرْسَانِ التُّرْكِ، وَسِلَاحُهُمْ يُثْقِلُهُمْ فِي الطَّلَبِ وَالهَرَبِ."
_"वल हिन्दु अहलु सब्रिन व उ़द्दतिन् सक़ीलतिन्, व लाकिन्नहुम यु'तौ-न मिन क़िल्लतिल ख़िफ़्फ़ति, फ़-लै-स लहुम कर्रुन व फ़र्रुन क-फ़ुरसानित् तुर्क-इ, व सिलाहुहुम युस्क़िलुहुम फ़ित् तलबि वल हरब।"_
*"भारतीय योद्धा धैर्यवान होते हैं और उनके पास भारी साजो-सामान (हाथी और भारी कवच) होता है, लेकिन उनकी हार का कारण उनकी फुर्ती की कमी होती है। उनके पास तुर्क घुड़सवारों की तरह अचानक हमला करके मुड़ जाने (ग़नीमी कावा/Hit-and-Run) की गतिशीलता नहीं होती, और उनका भारी हथियार पीछा करते समय या पीछे हटते समय उन पर बोझ बन जाता है।"*
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*इन सारे धार्मिक, दार्शनिक और ऐतिहासिक अरबी दस्तावेजों के अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि मध्यकाल में 'हिसन-ए-हिन्द' (भारतीय फौलाद की चमक) को पूरी अरब दुनिया में युद्ध कला का "गोल्ड स्टैंडर्ड" (सर्वोच्च मानक) स्वीकार किया गया था।* भारतीय धातुकर्म में काफी लम्बे समय से उच्च महारत रखते थे, यह महारत उनका जन्मजात गुण हैं, अभ्रक शुद्ध करने का तरीका केवल भारतीयों को पता था, तमिलनाडु से 4000 साल पुराने लोहे के शस्त्र मिल रहे हैं जिससे कुछ दिनों में यह भी निर्णायक रूप से साबित हो जायेगा कि भारतीयों ने लौहकर्म सबसे पहले शुरू किया और यही कारण हैं कि भारतीय ताम्रयुग से सीधे लौह युग में प्रवेश कर गये। भारत में कांस्य युग की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। वे धातुकर्म में आज भी आगे हैं। लेकिन कतिपय भ्रष्टाचारी कारणों और स्वार्थ की वजह से भारतीय लोग एक महान सभ्यता होने के अपने स्थान को दुबारा पाने में असमर्थ रहे हैं। इसके लिये हमें हमारे समाज में व्याप्त एक-एक बुराई को चुन-चुनकर निकालना होगा, सारे लोगों को शिक्षित करना होगा और एक सही बात पर सबको जुट करना होगा, और जो गलत करे या फसाद फैलाये उसे बिना किसी लाग-लपेट और देरी के समाज में सजा देना आरम्भ करना होगा। भ्रष्टाचार इतना ज्यादा बढ़ चुका हैं कि आज एक भारतीय दूसरे भारतीय पर विश्वास भी नहीं करना चाहता हैं।


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